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महिलाओं को धारण करना होगा ‘दुर्गा का स्वरूप

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आज आदर के तमाम केंद्र पर राजनीतिक लोग ही काबिज हो गए हैं। जबतक राजनीतिज्ञों को आदर के केंद्रों से उतारकर जमीन पर खड़ा नहीं किया जाएगा, तब तक भारत में ईमानदारी की कोई गुंजाइश नहीं बन सकती है। देश में तमाम टीवी और अखबार हैं, लेकिन उनमें से अधिकांश के मालिकान राजनीतिज्ञ हैं। स्वाभाविक रूप से ऐसे में अखबार में खबरें छपती हैं तो राजनीतिज्ञों की, चर्चाएं होती हैं तो राजनीतिज्ञों की, रेडियो पर तो हम वर्षों से रटा—रटाया ‘मन की बात’ सुन ही रहे हैं। टीवी पर खबरों से लेकर डिबेट तक के केंद्र में होते हैं राजनीतिज्ञ, यानी सब तरफ राजनीतिज्ञ छाए हुए हैं। अगर मंदिर से लेकर पुल—पुलिया—हाईवे तक का उद्घाटन करना है, तो मिनिस्टर, प्रधानमंत्री ही करेंगे। अगर समाज के चारों ओर छाने के लिए हमने राजनीतिज्ञों को खुला छोड़ दिया, तो यह पक्का समझिए कि इस देश में ईमानदारी के तमाम रास्ते आपने अपने लिए बंद कर लिए; क्योंकि राजनीति सबसे चतुर—चालाक ही नहीं, बल्कि एक धूर्त धंधा भी है। समाज की कई विषम परिस्थितियां होती हैं, जिनकी चर्चा हमें यदाकदा ही देखने-पढ़ने और सुनने को मिलती हैं। इन सारी समस्याओं की गहराई में जाकर देखें तो समाज के पुरुषों ने अपना आडंबर इतना बड़ा कर लिया है कि वह किसी भी तरह से किसी को भी अपने से बड़ा मानने के लिए तैयार ही नहीं है। कहा जाता है कि समाज में स्त्री-पुरुष को बराबरी का दर्जा दिया गया है, पर क्या यह सच है? स्त्री ने ही इस धरती पर हर एक बालक-बालिका को अपनी कोख में नौ महीने रखकर जन्म दिया है।

उसी से सृष्टि आगे बढ़ती रही है, लेकिन आज वही अपने ही देश में उपेक्षित है। यदि वह तरक्की करके ऊंचाई पर पहुंचती है, तो इसमें किसी का कोई उतना योगदान नहीं होता, बल्कि इसके लिए उनके गुण, उनकी योग्यता का योगदान होता है। जिसके दम पर वह बुलंदियों को हासिल करती है। इसमें सच में समाज और सरकार का किसी प्रकार का कोई योगदान नहीं होता है। हां, परिवार उसके पीछे अवश्य खड़ा होता है। जब वह अपनी ख्याति ईश्वर प्रदत्त निजी बल पर बढ़ा लेती है, फिर उसे आगे बढ़ाने में समाज उसकी परवाह करने लगता है। अन्यथा आप देश में अपने समक्ष पाएंगे कि अमुक स्थान पर वह महिला प्रताड़ित की गई है। यह सारा कृत्य समाज के पुरुषों द्वारा ही किए जाते रहे हैं। वही स्त्री, जो पुरुषों को जन्म देती है, जन्म का पहला आहार देती है, छोटे शिशु को सीने से चिपकाए रखकर उसे सुरक्षित रखती है बड़ा होकर वहीं बच्चा किसी स्त्री के साथ ऐसा कृतघ्न कैसे हो जाता है? इन मुद्दों पर कभी-कभी समाज में बहस भी होती है, समाज इसका हल ढूंढ भी लेता है, लेकिन जहां कुछ पुरुषों में स्त्रियों के प्रति दुराग्रह होता है, वहीं वह समय की तलाश में रहता है। कि कब उसे मौका मिले, ताकि वह अपनी दरिंदगी उसे दिखा सके। आप यह कभी नहीं सोचते कि सभी कभी किसी न किसी मां के गर्भ में भी पले होंगे, वहीं मां ने आपको मानव का स्वरूप दिया और फिर आपने अपनी दरिंदगी से किसी के जीवन को जन्मभर के लिए अभिशप्त कर दिया। विश्व में कई वैज्ञानिक संस्थानों द्वारा इन मुद्दों पर लगातार अध्ययन और शोध करता आया है।

यदि अध्ययन और शोध पर विशेष ध्यान दिया जाए। तो हाल ही में एक अध्ययन में चौंकाने वाली बात सामने आई है कि एक मां अपने गर्भधारण करने के वक्त से ही गर्भस्थ शिशु के प्रति कितना जागरूक और चौकन्ना रहती है, कितनी सजग रहती है। अमेरिका के बक इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च ऑन एजिंग के द्वारा किए गए एक शोध में शोधकर्ताओं ने पाया और यह दावा किया कि देर से प्रजनन और प्रसव का आनुवांशिक रूप से लंबी उम्र, कमजोर, धीमी एपीजेनेटिक उम्र बढ़ने से उम्र से संबंधित बीमारियां जैसे टाइप—2 डायबिटिक और अल्जाइमर्स के जोखिमों के कम करने से संबंध है। उम्र 21 से पहले गर्भ धारण करने वाली युवतियों में टाइप—2 डायबिटिक, मोटापा हार्ट फेल्योर और मोटापे का जोखिम दुगुना होता है। साथ ही गंभीर मेटाबॉलिज्म विकारों का जोखिम चार गुणा बढ़ जाता है। एक दूसरा शोध जो जर्मनी के हनोवर मेडिकल स्कूल की टीम द्वारा किया गया, उसमें जीनोस मैन में पांच स्थानों की खोज की गई, जो एण्डोमेट्रियल कैंसर के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इसी के साथ जनरल ई— बायो मेडिसिन में प्रकाशित निष्कर्षों ने एण्डोमेट्रियल कैंसर के लिए ज्ञात आनुवंशिक जोखिम कारकों की संख्या को 16 से बढ़ाकर 21 कर दिया है। इस शोध में गर्भाशय कैंसर के नए कारकों का पता चला है। ये रिस्क डीएनए में पाए गए हैं, जो ट्यूमर को बढ़ाने का काम करते हैं साथ ही गर्भाशय की लाइनिंग में मौजूद रहते हैं।

कोई भी जन्मदात्री भविष्य की खुशी के लिए इन तमाम पीड़ाओं को हंसकर सह और झेल लेती है, लेकिन यही शिशु बड़ा होकर एक से एक बड़ा गुनाह कर बैठता है जिसका उदाहरण हम तरह-तरह की घटनाओं को देखते और सुनते- पढ़ते रहते हैं। पुरुष द्वारा किए गए ऐसे दुर्दांत अपराध केवल आज ही हुआ हो या होता हो, ऐसा नहीं है, बल्कि पुरुषों के अत्याचार से महिलाएं अनादिकाल से ही जूझती रही हैं, जबकि वही देश—विश्व की निर्मात्री होती है। अब प्रश्न सबसे बड़ा आज भी वहीं का वहीं खड़ा है कि आखिर इन सारी समस्याओं की रोकथाम के लिए समाज क्या करे? पुलिस और सरकार क्या करे? इस तरह का कृत्य किसी खास जाति या वर्ण में ही होता हो, ऐसा नहीं है, बल्कि इस घृणित समस्या से तो हर वर्ग, हर समुदाय पीड़ित रहा है और आज भी है। किसी झोपड़ी में जाएं तो ऐसी ही स्थिति वहां भी है। और जो तथाकथित सभ्य—शिक्षित और सुसंस्कृत समाज है, वह भी इसी समस्या से जूझ रहा है। आज भी लड़कियां शाम-रात में अकेले निकल जाएं तो परिवार में किसी अनहोनी को लेकर सभी चिंतित रहते हैं।

यह चाहे शहर हो या सुदूर ग्रामीण परिवेश, पूरे देश में एकसमान समस्या है। सरकार ने तो इसके लिए कानून बना दिया है, लेकिन वह इतना दुरूह होता है कि पीड़िता कहीं कहीं तो किसी को बिना बताए इस तरह के अत्याचारों को सहती रहती है और अपनी बदनामी, समाज की उपेक्षा के कारण इन अत्याचारों को बर्दाश्त करती रहती है। यहां कोई भी इस गुनाहों को बंद करने में अपना योगदान देने में खुद को इतना साहसी नहीं बताया है। फिर आखिर घूमकर बात वहीं रुक जाती है कि इन बुराइयों के निपटान के लिए संविधान ने तो कानून बना दिया, लेकिन जिसके जिम्मे इस तरह के अपराध को रोकने का अधिकार दिया है, वे लगभग निष्क्रिय होते है और अपराध करने वाला अपने धनबल से, अपनी ऊपरी राजनीतिक पहुंच से छुटकर बच निकलता है। इन सभी समस्याओं में सबसे बड़ी समस्या तो महिलाओं के साथ इसलिए भी होती है, क्योंकि वह किसी अन्य परिवार से ब्याहकर दूसरी नई जगह पर आती है, लेकिन जिसका पुरुष पति ही उसका सबसे बड़ा संरक्षक होता है, वह भी परिवार के लिए साथ छोड़ जाता है और महिला आग की भेंट चढ़ जाती है। सामाजिक अत्याचार से बचकर आई तो घरेलू अत्याचार ने उसकी खुशियों और उसकी जिंदगी को सदा के लिए खत्म कर दिया। वैसे, जैसा कि पहले कहा गया है कि राजनीतिज्ञों ने अपने को समाज का अगुआ समझकर हर जगह आगे हो जाते हैं, वहीं इस तरह की बुराइयों को समाज से दूर करने के लिए कभी पुरजोर विरोध नहीं जताया गया है।

इसके लिए हमारे नेता तो जिम्मेदार तो हैं ही, समाज भी अपनी इन बुराइयों को दूर करने में सक्षम नहीं हो पाता, क्योंकि सभी परिवारों की समान समस्या है जिसके समाधान के लिए महिलाओं को स्वयं आगे आना होगा, अन्यथा पुरुष अपने बल से सदैव महिलाओं को प्रताड़ित करता रहेगा और समाज और ऐसे पुरुष अपने आतंक के बल पर हमारी जन्मदात्री के साथ दुराचार करते रहेंगे। इसलिए ऐसे अपराधियों, दुराचारियों को रानी झांसी लक्ष्मीबाई बनकर सबक सिखाओ।
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)

निशिकांत ठाकुर
लेखक वरिष्ठ पत्रकार

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