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अरावली जंगल सफारी परियोजना का विरोध, रद्द करने की उठी मांग

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राष्ट्रीय जलवायु और पर्यावर्णीय न्याय मंच ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्री और हरियाणा के मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजकर अरावली के 10000 एकड़ क्षेत्र में प्रस्तावित जंगल सफारी परियोजना को रद्द करने की मांग की है। संगठन ने इसे अरावली पारिस्थितिकी, स्थानीय समुदायों के अधिकारों और देशी वन्यजीवों के लिए गंभीर खतरा बताया है। गौरतलब है कि हरियाणा सरकार ने गुरुग्राम और नूंह ज़िलों में दुनिया का सबसे बड़ा क्यूरेटेड सफारी पार्क बनाने की योजना बनाई है। इसमें होटल, रेस्टोरेंट, झीलें, मनोरंजन पार्क और सफारी क्लब जैसे बड़े पैमाने के निर्माण शामिल हैं। सरकार का दावा है कि यह परियोजना जैव विविधता संरक्षण और पर्यावरण शिक्षा के लिए है, लेकिन मंच ने इसे व्यावसायिक पर्यटन केंद्रित बताया है। इनके अनुसार यह परियोजना उन ग्रामीणों की आजीविका और अधिकारों को प्रभावित करेगी, जो अरावली के जंगलों पर ईंधन, चारे और अन्य संसाधनों के लिए निर्भर हैं।

पर्यावरणविदों ने आरोप लगाया कि सामुदायिक अधिकार निलंबित कर दिए गए हैं, जो वन अधिकार अधिनियम 2006 और भारतीय वन अधिनियम 1927 का उल्लंघन है। करीब सौ गरीब परिवारों के विस्थापन की आशंका भी जताई गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि बाघ, शेर और चीते जैसी विदेशी प्रजातियों के लिए बनाए जाने वाले बाड़े अरावली की पारिस्थितिकी को नुकसान पहुँचाएंगे। इससे तेंदुए, सांभर, लकड़बग्घा और अन्य देशी प्रजातियों की आवाजाही बाधित होगी। भूजल पुनर्भरण और मरुस्थलीकरण रोकने वाले अरावली क्षेत्र पर निर्माण कार्य से जल संकट और प्रदूषण की समस्या और बढ़ेगी। संगठन का कहना है कि यह परियोजना 2023 के वन संरक्षण संशोधन अधिनियम की खामी का फायदा उठाकर आगे बढ़ाई जा रही है।

इस संशोधन को वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है। इसलिए सरकार को फैसले तक इंतजार करना चाहिए। इसके अलावा संगठन ने परियोजना रद्द करने के साथ चार विकल्प सुझाए हैं, जिनमें मुख्य रूप से अरावली में विज्ञान आधारित संरक्षण और पुनर्स्थापन योजना लागू करना, सामुदायिक अधिकार बहाल कर वन अधिकार अधिनियम का पालन करना, वास्तविक ईको-टूरिज्म मॉडल अपनाना और अरावली जैव विविधता पार्क जैसी पहल को बड़े पैमाने पर दोहराना है। राष्ट्रीय जलवायु और पर्यावर्णीय न्याय मंच ने स्पष्ट कहा है कि अरावली का भविष्य वाणिज्यिक सफारी पार्क में नहीं, बल्कि संरक्षण और सामुदायिक अधिकारों की रक्षा में है।

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