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मालाखेड़ा अलवर राजस्थान के निवासी सुनील साहू की जि़ंदगी कभी बेहद सामान्य थी। उनके पिता गर्मियों में आइसक्रीम फैक्ट्री चलाते थे और सर्दियों में रिक्शा चलाकर परिवार का पालन-पोषण करते थे। 3 भाई और 3 बहनों वाला यह खुशहाल परिवार साल 2012 में एक दर्दनाक मोड़ पर आ गया। सबसे बड़े भाई का देहांत हुआ, और फिर फैक्ट्री में रिसीवर ब्लास्ट हो गया, जिसमें सुनील के दोनों हाथ बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए।

डॉक्टरों ने जवाब दे दिया, समाज ने हार मान ली लेकिन उनकी मां और पिता ने नहीं। जयपुर के SMS अस्पताल में सुनील का इलाज शुरू हुआ, फिर अपेक्स हॉस्पिटल में महीनों ICU में रहने के बाद वे घर लौटे, लेकिन बिना हाथों के। जि़ंदगी का हर काम—खाना, पीना, चलना—मुमकिन नहीं था। मन में बार-बार आया कि ये जीवन क्यों बचा? इस खिलाडी को पुन्हाना में हो रही रामलीला में देखने के लिए बड़ी भीड़ उमड़ी। इसके अलावा कई अन्य नामचीन लोगों को भी आमंत्रित किया गया। इलाके में चल रही रामलीलाओं को लोकप्रिय और रोचक बनाने के लिए ऐसी हस्तियों को बुलाया जा रहा है। फिर अचानक एक और जिंदगी का सबसे झटका लगा: सुबह ठीक-ठाक बात करने वाले पिता, आधे घंटे में साइलेंट अटैक से चल बसे। कुछ ही समय में बड़ी बहन का भी देहांत हो गया। आइसक्रीम फैक्ट्री बंद हो गई।

पूरे परिवार की जि़म्मेदारी मां के कंधों पर आ गई, जो बड़े घरों में झाड़ू-पोंछा कर, मजदूरी कर, बेटे को फिर से खड़ा करने की ठान चुकी थीं। अगर बड़ा बनना है तो पहले छोटा बनना सीखो – यह सीख सुनील कुमार साहू को उनकी मां से मिली, और यही सीख उनकी पूरी जि़ंदगी की दिशा बन गई। एक दिव्यांग से योद्धा बनने की शुरुआत – आर्मी का सपना टूट चुका था, लेकिन एक नया सपना जन्म ले चुका था—पैरा ओलंपिक में भारत के लिए मेडल जीतना। देवेंद्र झाझरिया की कहानी पढ़कर सुनील ने फैसला किया—अब मेरी कमजोरी ही मेरी ताकत बनेगी। कोच अजीत सिंह राठौड़ ने नि:शुल्क ट्रेनिंग देना शुरू किया। पढ़ाई दोबारा शुरू की—12वीं पास की, बीएसटीसी किया, कोचिंग पवन सर ने फ्री करवाई। रिक्शा चलाकर मां का सहारा भी बने और खेल की ट्रेनिंग भी जारी रखी। कोटा में आनासागर टीटी कॉलेज में पढ़ाई के साथ मैदान में पसीना बहाया।

2018 में जिला स्तर पर पहला गोल्ड मेडल मिला ऐसा लगा जैसे दुनिया की सबसे बड़ी जीत हो इंटरनेशनल में गोल्ड मेडल जीता हो। इसके बाद राजस्थान में  राज्य स्तरीय गेम में  चौथा स्थान, फिर सालों की कड़ी मेहनत, चोट, त्याग, और धैर्य के बाद 5 साल तक असफलताओ का दौर जारी रहा उसके बाद लगातार फिर गत 3 वर्ष में 18 मेडल जीते जिसमें 11 गोल्ड मेडल जीते जिसमें 100 मीटर 400 मीटर दोनों में ऑल इंडिया फर्स्ट रैंक कैटेगरी में ओर इंटरनेशनल गेम में सिल्वर मेडल जीता लोग जंप में।राज्य स्तर राष्ट्रीय स्तर ओर खेलो इंडिया और अंतरराष्ट्रीय सफलता – 2022 में जयपुर सवाई मानसिंह स्टेडियम में दो मेडल जीते 100 मीटर 400 मीटर राष्ट्रीय स्तरीय प्रतियोगिता उड़ीसा में 100 मीटर में गोल्ड मेडल फिर 2023 में पहली बार अलवर स्टेडियम में मां की आंखों के सामने दौड़े और तीनों गोल्ड मेडल (100, 400, 1500 मीटर) जीते। पुणे में नेशनल गेम में फिर गोल्ड, और ब्रॉन्ज भी। इसके बाद खेलो इंडिया पैरा गेम्स 100 मीटर में दिल्ली में सिल्वर मेडल जीता, फिर चूरू में राज्य स्तर पर 3 गोल्ड 100 मीटर 400 मीटर 1500 मीटर में ,  फिर गोवा नेशनल में 400 मीटर में सिल्वर, बीकानेर में लॉन्ग जंप गोल्ड, और 100 मीटर 400 मीटर में सिल्वर मेडल अंतत: चेन्नई में ब्रॉन्ज 400 मीटर में लॉन्ग जंप में।

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