कन्या भ्रूण हत्या जैसी शर्मनाक घटनाओं के पीछे हमारे समाज में व्याप्त दहेज प्रथा जैसी बुराई प्रमुख कारण है क्योंकि कन्या के विवाह में माता-पिता को दहेज देना पड़ता है। इसी कारण अधिकतर माता-पिता संतान के रूप में केवल पुत्र की ही कामना करते है और कन्या भ्रूण को गर्भ में ही समाप्त करवा देते है जो कि कानूनन अपराध और महा पाप है। इस सामाजिक अपराध को समाप्त करने के लिए दहेज प्रथा को समाप्त करना बहुत जरूरी है। इसके लिए युवा वर्ग को आगे आना होगा। आज दहेज और बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं को समाप्त करने के लिए समाज को जागरूक करना बहुत जरूरी है। उपयुक्त आयु से पहले विवाह करने से दम्पति के स्वास्थ्य पर ही नहीं बल्कि जनसंख्या पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अत: बाल विवाह जैसी कुप्रथा को समाप्त करने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कारगर कदमों में विवाह की आयु सीमा तय करना सर्वाधिक महत्वपूर्ण कदम है। इस तथ्य में कोई संदेह नहीं है कि समाज प्रगति के पथ पर अग्रसर है, किन्तु फिर भी कुछ प्राचीन कुरीतियां आज भी समाज में पांव पसारे हुए है विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में दहेज प्रथा और बाल विवाह प्रमुख कुप्रथाएं हैं जिनके चलते अन्य समस्याएं जन्म लेती है।
विवाह के लिए युवक की आयु 21 वर्ष तथा कन्या की आयु 18 वर्ष निर्धारित की गई है। विवाह की यह आयु एकदम उपयुक्त आयु है क्योंकि इस आयु में युवक एवं युवतियां शारीरिक एवं मानसिक रूप से पूर्णतः: परिपक्व हो चुकी होती है। यह बात ग्रामीण क्षेत्र के निवासी शायद समझ नहीं पाते, यही कारण है कि देश के कुछ भागों के गांवों में बाल विवाह अधिक होते है। गांववासियों को सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन के प्रति जागरूक करने के लिए उन्हें शिक्षित करना बहुत जरूरी है। गांववासी शिक्षित होंगे तो वे इन कुप्रथाओं के कुप्रभाव को समझ सकेंगे यदि बच्चों को शिक्षा प्राप्ति हेतु स्कूल भेजा जाए तो विवाह की निर्धारित आयु तक वह शिक्षित एवं हर तरह से परिपक्व हो जाएगें।
उपायुक्त प्रीति ने बताया कि देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के कुशल नेतृत्व में केन्द्र व हरियाणा सरकार ने कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए विशेष ठोस कदम उठाए है और बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ कार्यक्रम की सही ढंग से शुरुआत की है परंतु सरकार के प्रयासों से ही कोई भी सामाजिक बुराई समाप्त नहीं हो सकती। इसके उन्मूलन की जिम्मेवारी पूरे समाज पर है। बाल विवाह और दहेज प्रथा जैसी बुराइयों को दूर करने के लिए युवा वर्ग के साथ-साथ स्वयंसेवी संस्थाओं की भागीदारी भी जरूरी है। समाज में जागरूकता की लहर की शुरुआत ही युवा वर्ग से होनी चाहिए। हाई स्कूलों और कॉलेजों में सामाजिक बुराइयों को दूर करने सम्बन्धी वाद-विवाद एवं भाषण प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाना चाहिए।
उन्हें शिक्षा प्राप्त करने, दहेज न लेने, दहेज न देने, अपने आस-पास बाल विवाह को रोकने का संकल्प दिलवाना चाहिए। इसी प्रकार के कारगर एवं सकारात्मक कदम ग्राम पंचायतें, समाज कल्याण संस्थाएं, आंगनबाड़ियों और स्वयंसेवी संस्थाएं भी उठाएं तो समाज में जागरूकता लाना सम्भव है। सामाजिक कुरीतियों की समाप्ति के लिए सबसे पहले यह बहुत जरूरी है कि समाज के हर वर्ग के लिए शिक्षा प्राप्ति आवश्यक हो। सभी स्कूल जाने योग्य बच्चों का स्कूलों में पंजीकरण करके उनकी नियमित शिक्षा को सुनिश्चित किया जाए, विशेष रूप से नारी शिक्षा को प्रोत्साहित किया जाना बहुत जरूरी है। हरियाणा सरकार द्वारा लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए विशेष कदम उठाए गए है। शिक्षित लोग ही एक स्वस्थ समाज का नव निर्माण करने में सक्षम होते हैं। इस दिशा में पंचायतें, सरकारी विभाग व जन सामान्य अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते है।