अमेरिका द्वारा भारत के निर्यात पर 50% टैरिफ लगाने का निर्णय केवल एक व्यापारिक कदम नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक समीकरणों में एक बड़ा बदलाव है। पहले यह टैरिफ औसतन 25% था, लेकिन अब इसमें दोगुना बढ़ोतरी की गई है। इस बढ़े हुए टैरिफ का सबसे ज्यादा असर उन श्रम-प्रधान उद्योगों पर पड़ेगा, जो अमेरिकी बाजार पर निर्भर हैं। खासकर वस्त्र एवं रेडीमेड गारमेंट, रत्न-आभूषण, चमड़ा, और समुद्री खाद्य पदार्थों के निर्यात को सीधा झटका लगने वाला है। अमेरिका भारत के लिए एक बड़ा निर्यात बाजार है और करीब 60 अरब डॉलर से ज्यादा का व्यापार इस फैसले से प्रभावित हो सकता है। पहले भारत से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर औसत सीमा शुल्क 25% था, जो अब बढ़कर 50% कर दिया गया है। यह बढ़ोतरी खासकर तैयार वस्त्रों, गारमेंट्स, चमड़ा उत्पाद, इंजीनियरिंग गुड्स, हैंडीक्राफ्ट्स और कुछ कृषि उत्पादों पर लागू हुई है।
अमेरिका का यह कदम ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति और भारत-रूस ऊर्जा व्यापार को लेकर बढ़ते तनाव का नतीजा माना जा रहा है। भारत आज विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और 2030 तक तीसरे स्थान पर पहुंचने की दिशा में अग्रसर है। इस समय भारत की जीडीपी लगभग 4.19 ट्रिलियन डॉलर से है और लगातार 6.5% से अधिक की विकास दर बनाए हुए है। ऐसे में अमेरिका का यह कदम निश्चित रूप से निर्यात और रोजगार पर दबाव डालेगा। विशेषज्ञों का अनुमान है कि भारत की जीडीपी वृद्धि दर पर इसका 0.4–0.8 प्रतिशत अंक का असर पड़ सकता है। हालांकि, भारत की अर्थव्यवस्था अब किसी एक बाजार पर पूरी तरह निर्भर नहीं है। बीते वर्षों में भारत ने आसियान देशों, यूरोपीय संघ, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के साथ व्यापार बढ़ाने पर जोर दिया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विज़न आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया और प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम के जरिए भारत को वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनाने का है। इस टैरिफ के बावजूद, भारत सरकार ने निर्यातकों को राहत देने के लिए कई कदम उठाने की तैयारी की है। हाल ही में ₹25,000 करोड़ के ‘एक्सपोर्ट प्रोमोशन मिशन’ का ऐलान किया गया है, जिसमें वित्तीय सहायता, मार्केट डाइवर्सिफिकेशन और ब्रांड इंडिया की ग्लोबल ब्रांडिंग शामिल है। भारतीय उद्योगपति हमेशा कठिन परिस्थितियों से निकलने का रास्ता खोजते हैं और इस बार भी अलग नहीं होगा। अमेरिका द्वारा लगाए गए 50% टैरिफ निश्चित रूप से एक बड़ी चुनौती है, लेकिन भारतीय उद्योग और उद्यमी चुनौतियों को अवसर में बदलने की क्षमता रखते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विज़न आत्मनिर्भर भारत और ‘मेक इन इंडिया’ इसी सोच को मजबूत करता है। हमें इस परिस्थिति से घबराने की आवश्यकता नहीं है। भारत का विनिर्माण क्षेत्र लगातार सशक्त हो रहा है और हमारे पास तकनीक, कौशल और नवाचार की ताकत है। अमेरिकी बाजार पर निर्भरता घटाना अब प्राथमिकता है। लैटिन अमेरिका, अफ्रीका, यूरोप, मध्य एशिया और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में भारतीय उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है। खासतौर पर वस्त्र, इंजीनियरिंग गुड्स, ऑटोमोबाइल कंपोनेंट्स, फार्मा और आईटी सेवाओं में भारत के लिए बड़े अवसर हैं। साथ ही, यह समय है जब भारतीय सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग लागत दक्षता और गुणवत्ता सुधार पर ध्यान केंद्रित करें। वैश्विक सप्लाई चेन में चीन की पकड़ कमजोर पड़ रही है, ऐसे में भारत के पास अपना हिस्सा बढ़ाने का सुनहरा मौका है।
भारत आज विदेशी निवेश के लिए सबसे आकर्षक गंतव्यों में से एक है। पिछले वर्ष भारत में $85 बिलियन से अधिक का FDA आया। देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्टार्टअप इकोसिस्टम और मजबूत घरेलू मांग इस बात की गारंटी है कि कोई भी बाहरी झटका भारत की विकास गति को लंबे समय तक नहीं रोक सकता। विश्व बैंक और आईएमएफ दोनों ने अनुमान लगाया है कि भारत 2025 में भी सबसे तेजी से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था बना रहेगा। दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था , भारत, सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में उभरा है और 2030 तक 7.3 ट्रिलियन डॉलर की अनुमानित जीडीपी के साथ दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की राह पर है।
भारत के दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था (2025-26 में 6.3% से 6.8%) बनने का अनुमान है। यह परिवर्तन प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में एक दशक के निर्णायक शासन , दूरदर्शी सुधारों और वैश्विक जुड़ाव का परिणाम है। मज़बूत घरेलू माँग, गतिशील जनसांख्यिकीय प्रोफ़ाइल और निरंतर आर्थिक सुधारों से प्रेरित होकर, भारत वैश्विक व्यापार, निवेश और नवाचार में अपने बढ़ते प्रभाव का दावा कर रहा है । कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन में, प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जगदीश भगवती ने कहा: “पुराने दिनों में, विश्व बैंक भारत को बताता था कि उसे क्या करना है, लेकिन अब, भारत विश्व बैंक को बताता है कि उसे क्या करना है।” यह कथन पिछले ग्यारह वर्षों में भारत के एक आश्रित अर्थव्यवस्था से एक आत्मनिर्भर , वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी महाशक्ति बनने के परिवर्तन को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। इस परिवर्तन के मूल में आत्मनिर्भर भारत का दृष्टिकोण है, जो नवाचार, उद्यमशीलता और तकनीकी संप्रभुता को बढ़ावा देने वाला एक आंदोलन है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में, उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजनाओं, एमएसएमई के पुनरोद्धार और डिजिटल बुनियादी ढांचे के विस्तार जैसी रणनीतिक पहलों ने उच्च-विकास, उच्च-अवसर वाली अर्थव्यवस्था की नींव रखी है। इस विज़न का केंद्रबिंदु समावेशी और समतामूलक विकास भी है ।
सरकार की नीतियाँ रोज़गार सृजन , छोटे व्यवसायों को समर्थन , सार्वजनिक निवेश में वृद्धि और मध्यम वर्ग व उद्यमियों के वित्तीय सशक्तिकरण पर केंद्रित रही हैं, जिससे यह सुनिश्चित हुआ है कि आर्थिक प्रगति से प्रत्येक नागरिक को लाभ हो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत का आर्थिक विकास केवल गति निर्माण के बारे में नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र के आर्थिक भाग्य को नया आकार देने के बारे में है । आज, भारत एक ऐसा राष्ट्र है जो डिजिटल , हरित, आकांक्षी और भविष्य के लिए तैयार है , और वैश्विक नेता बनने के अपने लक्ष्य की ओर दृढ़ता से आगे बढ़ रहा है। पिछले एक दशक में भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में उल्लेखनीय परिवर्तन आया है। वर्तमान मूल्यों पर , जीडीपी 2014-15 के ₹106.57 लाख करोड़ से बढ़कर 2024-25 में अनुमानित ₹331.03 लाख करोड़ हो गई है, जो मात्र दस वर्षों में लगभग तीन गुना वृद्धि है । अकेले 2024-25 में, नाममात्र जीडीपी पिछले वर्ष की तुलना में 9.9% बढ़ी , जबकि वास्तविक जीडीपी (स्थिर मूल्यों पर) 6.5% बढ़ी , जो निरंतर आर्थिक गति को दर्शाती है। यह तीव्र वृद्धि देश के विस्तारित आर्थिक आधार और बढ़ते आय स्तर को दर्शाती है। बढ़ी हुई वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता के बल पर, भारत तेज़ी से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए दुनिया के सबसे आकर्षक गंतव्यों में से एक बन गया है। प्रमुख अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग और रणनीतिक पहलों में सुधार से निवेशकों का विश्वास बढ़ा है। सरकार का लक्ष्य अब वार्षिक एफडीआई प्रवाह को बढ़ाकर 100 अरब अमेरिकी डॉलर करना है, जो वर्तमान पाँच-वर्षीय औसत 70 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक है , और यह बदलती आपूर्ति श्रृंखलाओं के बीच भारत को एक वैश्विक निवेश केंद्र के रूप में स्थापित करने के प्रयासों के अनुरूप है।
अमेरिकी टैरिफ भारत के लिए तात्कालिक दबाव जरूर लाएगा, लेकिन यह भारतीय उद्योगों को नए बाजारों की खोज, प्रतिस्पर्धा बढ़ाने और ब्रांड इंडिया को मजबूत करने का मौका भी देगा। प्रधानमंत्री मोदी का भरोसा और उद्योगपतियों का आत्मविश्वास यही संकेत देते हैं कि भारत इस चुनौती से उभर कर और मजबूत होगा।आज जरूरत है कि हम घबराने के बजाय तैयारी करें, दक्षता और नवाचार को बढ़ाएं और इस संकट को भारत की वैश्विक आर्थिक ताकत को और प्रबल करने के अवसर में बदल दें।
(लेखक के अपने विचार है)

BR भाटिया
पूर्व प्रधान, फरीदाबाद इंडस्ट्रीज एसोसिएशन