हिमाचल प्रदेश में मौसम का मिजाज अभी भी बिगड़ा हुआ है और आमजन में इस बार हुई तबाही को लेकर बेचैनी का आलम है। 20 जून से 9 सितंबर, 2025 तक बादल फटने, अचानक बाढ़ आने और भूस्खलन की घटनाओं से इस बार हिमाचल प्रदेश को अनुमानित 4122 करोड़ का नुकसान हुआ है। हिमाचल में तीन नेशनल हाईवे के साथ 744 सडकें बंद पड़ी हुई हैं। इसके साथ ही प्रदेश में 959 बिजली ट्रांसफार्मर खराब हुए हैं तो 472 पेयजल की योजनाएं भी बंद हैं और 466 लोगों की मृत्यु हुई है। इसी बीच मंगलवार 9 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने हिमाचल दौरे के दौरान हुए नुकसान का जायजा लिया, 1500 करोड़ रुपए के राहत पैकेज की घोषणा की और मृतकों के परिजनों को 2 लाख रुपए की अनुग्रह राशि दिए जाने की बात कही है। दूसरी तरफ हिमाचल प्रदेश विधानसभा का मानसून सत्र इस बार सिर्फ विधायी औपचारिकताओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सत्र से पहले और सत्र के दौरान ही प्रदेश में भारी बारिश, भूस्खलन और बादल फटने की घटनाओं से आमजन को हो रही पीड़ा, संकट और उम्मीदों पर चर्चा का गवाह भी बना।
18 अगस्त से 2 सितंबर 2025 तक चले इस सत्र में बारह बैठकों में कई बार राजनीतिक टकराव, विपक्ष के बहिष्कार और सत्ता पक्ष की सफाई पर ध्यान आकर्षित किया, लेकिन सबसे गहरी गूंज आपदा और उससे जुड़े पुनर्निर्माण की ही रही। इस बार लगातार बारिश, भूस्खलनों और बादल फटने की घटनाओं ने प्रदेश के कई जिलों के नागरिकों को असहज और असहाय स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया। चंडीगढ़-मनाली राष्ट्रीय राजमार्ग लंबे समय तक ठप रहा तो वहीं मणिमहेश यात्रा भी स्थगित करनी पड़ी। कई जगहों पर कई किलोमीटर सडकें धरातल पर से ही गायब हो चुकी हैं। बागवानों का नुकसान अलग है क्योंकि उनके सेब बॉक्स सेब बागानों से निकल ही नहीं पा रहे हैं, वहीं दरसंचार सेवाएं भी प्रभावित हुई हैं। मॉनसून और बारिश के तांडव के चलते हिमाचल के शिक्षण संस्थानों में छुट्टियां करनी पड़ी हैं। कुल मिलाकर इस बार मॉनसून की बारिशों ने हिमाचल के नागरिकों को वर्षों न भूलने वाले जख्म दिए हैं।
हिमाचल सरकार ने राज्य में आई इस आपदा को राष्ट्रीय आपदा घोषित करने का प्रस्ताव पारित किया है और मानचित्र आधारित क्षति का विस्तृत आकलन, जीआईएस आधारित तस्वीरें और व्ययों का ब्यौरा केंद्र सरकार को भेजा गया है। इन हालात ने यह साफ कर दिया कि हिमाचल की त्रासदी महज प्राकृतिक आपदा भर नहीं है, बल्कि अव्यवस्थित निर्माण, अंधाधुंध कटान और जलवायु परिवर्तन के संगम से पैदा हुआ एक संरचनात्मक संकट है। वहीं कई नागरिकों की मान्यता में धर्मस्थलों में लोगों का गैर मर्यादित व्यवहार, आचरण एवं पहनावा भी कहीं न कहीं देवताओं की नाराजगी से उपजा संकट है। आपदा की गूंज के साथ-साथ विधानसभा में आर्थिक हालात का बोझ भी चर्चा में रहा। राज्य का राजस्व घाटा सकल घरेलू उत्पाद का 2.5 प्रतिशत यानी लगभग 6390 रोड़ रुपए आंका गया है, जबकि वित्तीय घाटा 4 प्रतिशत यानी 10338 करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। कर्ज का बोझ एक लाख करोड़ रुपए के करीब पहुंच गया है, ऐसे में राहत और पुनर्निर्माण के लिए संसाधन जुटाना सरकार के लिए किसी कठिन पहाड़ी चढ़ाई चढ़ने जैसा ही है। इसी बीच कर्मचारियों और पेंशनरों की मांगों की आवाज भी सदन के गलियारों में गूंजती रही।
जुलाई 2023 से लंबित महंगाई भत्ते का एरियर, छठे वेतन आयोग के लाभ और लंबे समय से रोके गए महंगाई भत्तों की मांग को लेकर कर्मचारी आंदोलित हैं तो विपक्ष ने भी इसे मुद्दा बनाकर सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगाया है, जबकि सत्ता पक्ष ने आर्थिक तंगी का हवाला देते हुए पहली प्राथमिकता आपदा राहत कार्यों को बताया है। राजनीतिक दृष्टि से यह सत्र दिलचस्प रहा, सरकार और विपक्ष दोनों आपदा पर गंभीर दिखे, लेकिन रणनीति अलग-अलग रही। तथ्य यह भी रहा कि सत्र ने विधायी कार्यों की दृष्टि से भी अपना महत्व बनाए रखा। कुल 11 सरकारी विधेयक पास किए गए, एक विधेयक वापस लिया गया और शून्यकाल के दौरान 43 मुद्दे उठाए गए। नियम 67, 62, 130, 101 और 102 जैसे प्रावधानों के तहत लंबी बहसें चलीं। आपदा पर ही 33 घंटे चर्चा हुई। प्रश्नकाल के दौरान कुल 690 सवाल उठे और 1118 बच्चों ने सदन की कार्यवाही को प्रत्यक्ष देखा। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने सत्र के समापन पर कहा कि यह खट्टे-मीठे अनुभवों का समय रहा और भविष्य में अगस्त की बजाय सितंबर में सत्र बुलाने पर विचार होना चाहिए, क्योंकि अगस्त का महीना आपदा की दृष्टि से हमेशा कठिन रहता आया है। विपक्ष के नेता जयराम ठाकुर ने भी स्वीकार किया कि सत्र लंबा और उपयोगी रहा, लेकिन उन्होंने सरकार पर आर्थिक प्रबंधन में असफलता और संस्थान बंद करने जैसी नीतियों को लेकर सवाल उठाए।
कुल मिलाकर, यह मानसून सत्र प्रदेश की त्रासदी और राजनीति दोनों का मंच बना। जनता की नजर में असली सवाल यही है कि क्या इन बहसों से कोई ठोस समाधान निकला? निष्कर्षत: यही कहा जा सकता है कि 2025 का मानसून हिमाचल के लिए एक और कठिन परीक्षा बन गया। ऐसे में विधानसभा सत्र तभी सार्थक साबित होगा जब तात्कालिक राहत, कर्मचारियों-पेंशनरों की जायज मांगों, दीर्घकालीन ढांचागत सुधार और वित्तीय अनुशासन को समान प्राथमिकता दी जाएगी। राजनीति के आरोप-प्रत्यारोप से परे, जनता अपना मूल्यांकन इस आधार पर करेगी कि सडकें कितनी जल्दी खुलती हैं, बिजली-पानी कितनी तेजी से बहाल होते हैं और पुनर्निर्माण कितनी दूरदर्शिता से किया जाता है। हिमाचल की जनता अब भाषणों से आगे बढ़कर धरातल पर परिणाम चाहती है और यही इस मानसून सत्र की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।
(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)

अनुज आचार्य
लेखक बैजनाथ से हैं