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नैनो तकनीक में बढ़ते अवसर

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नैनो तकनीक, भारतीय इंजीनियरिंग स्नातकों के लिए उपलब्ध सर्वाधिक चर्चित करियर विकल्पों में से एक बनकर उभर रही है। मेडिसिन से लेकर ऐयरोस्पेस तक तथा इंजीनियरिंग से लेकर अनेक औद्योगिक एवं तकनीकी क्षेत्रों तक, नेनो तकनीक सभी समस्याओं से निपटने का आदर्श मंच होगी। हालांकि शुरुआती अवस्था में, चौतरफा हो रहे तकनीकी विकास को देखते हुए भारत में यह आने वाले वर्षों में त्वरित गति से उभरने के लिए तैयार है।भारत ने इंडियन इंस्टीट्यूट आफ साइंस, बैंगलोर (आईआईएससी) और इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्रोलाजी, बाम्बे (आईआईटीबी) में नेनो इलेक्ट्रानिक्स में शोध एवं विकास को गति देने के लिए 2008 में एक अभियान आरंभ किया । आवश्यकता थी कि नेनो इलेक्ट्रानिक्स में विशेषज्ञता प्राप्त छात्रों की संख्या अधिक हो और इस सेक्टर में भारी अवसर हैं।

अवसर ब्लू चिप कंपनियों के साथ होते हैं जहां लगातार शोध एवं विकास कार्य किए जाते हैं जो उन इंजीनियरों को प्रत्यक्ष तजुर्बा पाने का अवसर देते हैं जो इस क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते हैं।योग्यता नेनो तकनीक विशेषज्ञ बनने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति ने विषय में परास्नातक की पढ़ाई कर रखी हो। भारत में संस्थानों व विश्वविद्यालयों द्वारा एमटेक व एमएससी डिग्रियां प्रस्तावित की जाती हैं जो भौतिकी, रसायन एवं बायोतकनीक में डिग्री होना मांगते हैं। संभावना व परिप्रेक्ष्य नेनो तकनीक विद को मेडिसिन, बायो टक्रोलाजी, फूड एवं बेवरेज, पर्यावरण उद्योग, फोरेंसिक विज्ञान, जेनेटिक्स, अध्यापन, स्पेस रीसर्च व अन्य अनेक क्षेत्रों में नौकरी मिल सकती है। भविष्य 50 से अधिक वर्षों से, ट्रांजिस्टरों के लघु चित्रण, जो सभी इलेक्ट्रानिक चिप्स का निर्माणकारी हिस्सा है, सेमी कंडक्टर इंडस्ट्री चलाता आया है। इस लघु चित्रण ने प्रत्येक दो साल में एक चिप में ट्रांजिस्टर सघनता के दूने रुझान का पालन किया है और जो मूर के नियम के रूप में आमतौर पर विख्यात है। सामान्य रूप से, ट्रांजिस्टर का आकार घटाना अधिक तेज गति वाले तथा सस्ती कीमत पर कम ऊर्जा खपत वाले इलेक्ट्रानिक उत्पादों के बनने में सहायता करता है। टिकाऊ तकनीकी नवीनता एवं विवध उपयोगों के आर्थिक दबावों ने सेमी कंडेक्टर इंडस्ट्री को मूर नियम आधारित निर्बाध प्रगति का अवसर प्रदान किया है।

इन वर्षों में, ट्रांजिस्टरों के आकार 1980 में मौजूद माइक्रोमीटर से भी छोटे हुए हैं और अब ये वर्तमान तकनीकी विकास की आंधी में और घटकर दस नेनोमीटर पर आ गए हैं। ट्रांजिस्टरों के नेनो स्तरीय आयामों में बदलने से, विभिन्न तकनीकी चुनौतियां उभरी हैं। इसके अलावा, हम अब कंप्यूटर युग के नए युग में प्रवेश कर गए हैं।  कृत्रिम मेधा, स्वचालित प्रणालियों, बिग डाटा, इंटरनेट सामग्री, फाइवजी, एवं अन्य उपयोग संगणना का प्रमुख हिस्सा बन गए हैं। ये उपयोग अपार मात्रा में डाटा उत्पन्न करते हैं व उनकी खपत करते हैं तथा अघोषित उच्च कंप्यूटेशनल ऊर्जा की मांग करते हैं। यह अब स्पष्टï है कि आर्ट ट्रांजिस्टर मामलों को अत्यंत लघु रूपों में माप लेने के बावजूद, नवयुगीन संगणना की आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं        हो सकती। 

नवीन उपयोगों से ऊर्जा-सक्षम संगणना की मांग ने नेनो इलेक्ट्रानिक उपकरणों पर शोध को अनिवार्य बना दिया है। नेनो इलेक्टा्रनिक्स पर शोध विभिन्न मोर्चो पर चल रहा है। लोअर डायमेंशन सामग्रियों मसलन नेनो तारों की खोज की जा रही है। ट्रांजिस्टर उपयोगों के लिए नयी सामग्रियों की खोज के अलावा, नए कार्यात्मक सिद्धांतों वाले खोज आधारित नेनो इलेक्ट्रानिक उपकरणों में त्वरित उन्नति हुई है। इन खोज आधारित उपकरणों में, आर्ट ट्रांजिस्टरों के स्थान लेने वालों में टनल ट्रांजिस्टर अधिक आश्वस्तकारी नजर आते हैं। एक और रुझान, जो कि ऊर्जा आधारित सघन डाटा उपयोग से संचालित है, जो उच्च पूर्वानुमान संगणना से संभावनायुक्त कंप्यूटिंग, क्वांटम कंप्यूटिंग, एप्रोक्सिमेट कंप्यूटिंग एवं जैव-प्रेरित कंप्यूटिंग जैसे नवीन कंप्यूटिंग डायमेंशन तक आगे ले जाना है। ये कंप्यूटिंग प्रणालियां ऐसी अनोखी विशिष्टïताएं दिखाती हैं जिन्हें आज की उन्नत ट्रांजिस्टर भी प्रस्तुत नहीं कर सकते। हालांकि, इन नए कंप्यूटिंग आयामों को प्रणाली स्तर एवं उपकरण स्तर दोनों पर नवोन्मेष की आवश्यकता होती है, जिसे संभावना है कि नेनो में शोध कार्यक्रम प्रदान कर सकते हैं।

इस कारण, कंप्यूटिंग के नए दौर के आरंभ होने से, हमने शोध व नवोन्मेषन के नए दौर में प्रवेश कर लिया है। यद्यपि कृत्रिम मेधा, बिग डाटा व इंटरनेट सामग्री आदि के उपयोग, एवं हमारे दैनिक जीवन में उनका प्रभाव दिखाई दे रहा है, मगर विभिन्न तकनीकें है जिन्हें इन उपयोगों को पूर्णतया सशक्त बनाने के लिए विकसित करने की आवश्यकता है। उनमें, नेनोइलेक्ट्रानिक्स सर्वाधिक महत्वपूर्ण क्षमतावानों में से एक है। आने वाले समय में, नेनो इलेक्ट्रानिक्स में शोध महत्वपूर्ण हो जाएगा, जैसा कि मूर के नियमों पर आधारित लघुप्रारूपण से मिलने वाला आसान लाभ जल्द प्राप्त होने लगेगा। लेखक इन्द्रप्रस्थ इंस्टीट्यूट आफ इंफार्मेशन टेक्रोलाजी, दिल्ली में सहायक प्रोफेसर हैं।

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