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हिमाचल प्रदेश में छात्र संघ चुनाव का औचित्य

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हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय और राज्य के अन्य शिक्षण संस्थानों में छात्र संघ चुनावों का इतिहास संघर्षों और
विवादों से भरा रहा है। छात्र राजनीति ने न केवल नेताओं को जन्म दिया, बल्कि यह लोकतंत्र, समाज और राष्ट्र के प्रति जागरूकता और समझ भी उत्पन्न करने का एक सशक्त माध्यम रही है। छात्र जब कॉलेज और
विश्वविद्यालय में पढ़ता है, तो उसका दृष्टिकोण केवल शिक्षा तक सीमित नहीं रहता। वह समाज, लोकतंत्र और
अपने अधिकारों को समझने लगता है। छात्र संघ और विभिन्न आंदोलनों में भाग लेने से उसे नेतृत्व, जिम्मेदारी
और समाज के प्रति संवेदनशीलता का अनुभव मिलता है। यही वह समय है जब छात्र भविष्य के नागरिक और नेता के रूप में परिपक्व होते हैं।

छात्र संघ चुनावों पर पहली बार 1985 में रोक लगाई गई थी। इसके बाद 1988 में नासिर खान की हत्या के बाद चुनावों पर पुन: रोक लगाई गई। 1995 में कुलदीप पठानिया की हत्या के बाद भी चुनावों पर प्रतिबंध रहा। 2000 में यह प्रतिबंध हटाया गया, लेकिन 2014 में कुलपति पर हमले और बढ़ते तनाव के कारण चुनावों पर स्थायी रोक लगा दी गई। इन घटनाओं ने प्रशासन को चुनावों पर रोक लगाने के लिए मजबूर किया। छात्र संघ चुनावों के दौरान हिंसा की घटनाएं आम हो गई थीं, जिसके कारण न केवल छात्रों की जानें गईं, बल्कि विश्वविद्यालय की संपत्ति को भी भारी नुकसान हुआ। 2010 में विश्वविद्यालय परिसर में विभिन्न छात्र संगठनों के बीच हुई झड़पों में कई कमरे, पुस्तकालय और उपकरण क्षतिग्रस्त हुए। इन घटनाओं ने चुनावों पर रोक लगाने को अपरिहार्य बना दिया। हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने विश्वविद्यालयों में हिंसा और अव्यवस्था को लेकर कई महत्वपूर्ण आदेश दिए हैं।

2012 में हुई हिंसा के बाद उच्च न्यायालय ने शिमला के पुलिस महानिरीक्षक से रिपोर्ट तलब की कि क्या विश्वविद्यालय के छात्रावासों में केवल छात्र ही रह रहे हैं या बाहरी लोग भी शामिल हैं। अदालत ने यह भी पूछा कि ऐसे बाहरी लोगों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई और परिसर में सुरक्षा सुनिश्चित की गई। देश के अन्य शिक्षण संस्थानों में स्थिति अलग है। राजस्थान में इस सत्र छात्र संघ चुनाव नहीं होंगे, क्योंकि राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू हो रही है। पश्चिम बंगाल में 2017 से अब तक छात्र संघ चुनाव नहीं हुए हैं। झारखंड (रांची विश्वविद्यालय)
में पिछले पांच वर्षों से चुनाव नहीं हो रहे हैं। पांडिचेरी विश्वविद्यालय में छात्र चुनाव 2019 के बाद स्थगित हैं।
पटना विश्वविद्यालय ने हाल ही की हिंसा और माहौल की चिंता के चलते छात्र संघ चुनाव ‘शांत स्थिति आने पर
ही संभव होने की बात कही। जेएनयू में 2008-2012 तक चुनाव बंद रहे, अब वहां चुनाव पुन: शुरू हो चुके हैं।
हिमाचल प्रदेश की राजनीति में कई नेता छात्र राजनीति से उभरे हैं। इनमें प्रमुख हैं : सतपाल सत्ती, कामरेड राकेश सिंघा, केवल सिंह पठानिया, और भी।

इसके अलावा, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से निकलकर राष्ट्रीय स्तर के छात्र नेता बने आशीष चौहान (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय संगठन मंत्री), निगम भंडारी (भारतीय राष्ट्रीय छात्र संघ) और विक्रम सिंह (Student Federation of India) शामिल हैं। ये नेता न केवल छात्र राजनीति में सक्रिय रहे, बल्कि बाद में राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व क्षमता और सामाजिक समझ का प्रदर्शन कर चुके हैं। हालांकि, छात्र संघ चुनावों पर रोक के बावजूद, 2025 के मानसून सत्र में विधानसभा में इस मुद्दे पर चर्चा हुई। 22 अगस्त 2025 को भाजपा विधायक विपिन सिंह परमार ने छात्र संघ चुनावों की बहाली की मांग उठाई। उन्होंने कहा कि छात्र संघ चुनाव भविष्य के नेताओं को तैयार करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम हैं। इसके जवाब में शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर ने कहा कि वर्तमान में छात्र संघ चुनाव बहाल नहीं किए जाएंगे, क्योंकि चुनावों के दौरान हिंसा की घटनाएं बढ़ जाती हैं। हालांकि, उन्होंने भविष्य में इस मुद्दे पर विचार करने की बात भी कही। छात्र राजनीति न केवल नेताओं को जन्म देती है, बल्कि यह समाज और राष्ट्र के प्रति जागरूकता और समझ भी उत्पन्न करती है। चुनावों में हिंसा की घटनाएं चिंता का विषय हैं, लेकिन लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भागीदारी से युवाओं में जिम्मेदारी और सामाजिक चेतना का विकास होता है।

अत: यह आवश्यक है कि छात्र संघ चुनावों को बहाल किया जाए, साथ ही साथ हिंसा और संपत्ति को हुए नुकसान को रोकने के लिए ठोस उपाय किए जाएं। छात्र जब विश्वविद्यालय में पढ़ता है, तो उसके विचार, समझ और जिम्मेदारी का निर्माण छात्र राजनीति के अनुभवों से होता है। नेतृत्व क्षमता, समाज के प्रति संवेदनशीलता और राष्ट्र के प्रति जागरूकता छात्र इसी समय सीखते हैं। यही कारण है कि छात्र संघ चुनावों को बहाल करना न केवल युवाओं के लिए आवश्यक है, बल्कि यह लोकतंत्र और समाज की मजबूती के लिए भी जरूरी है। सियासी गतिविधियों में भाग लेकर छात्रों में नेतृत्व के गुण पैदा होते हैं। यहीं से निकली पौध आगे चलकर देश को अच्छा नेतृत्व दे सकती है। इस दृष्टि से छात्र संघ चुनाव होने ही
चाहिएं।

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)

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