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उच्चतम न्यायालय ने लापता बच्चों के मामलों को गंभीर मुद्दा बताया

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उच्चतम न्यायालय ने 18 नवंबर को एक समाचार पर चिंता व्यक्त की, जिसमें दावा किया गया है कि देश में हर 8 मिनट में एक बच्चा लापता हो जाता है। न्यायालय ने इसे एक गंभीर मुद्दा बताया। न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने कहा कि देश में गोद लेने की प्रक्रिया जटिल है और उसने केंद्र से इस प्रणाली को सुव्यवस्थित करने को कहा। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने मौखिक रूप से कहा, मैंने अखबार में पढ़ा है कि देश में हर 8 मिनट में एक बच्चा लापता हो जाता है। मुझे नहीं पता कि यह सच है या नहीं। लेकिन यह एक गंभीर मुद्दा है।

शीर्ष अदालत ने कहा कि चूंकि गोद लेने की प्रक्रिया कठोर है इसलिए इसका उल्लंघन होना स्वाभाविक है और लोग बच्चा पाने के लिए अवैध तरीके अपनाते हैं। सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने लापता बच्चों के मामलों से निपटने के लिए एक नोडल अधिकारी नियुक्त करने के वास्ते 6 सप्ताह का समय मांगा। बहरहाल, उच्चतम न्यायालय ने 6 सप्ताह का समय देने से इनकार कर दिया और एएसजी को 9 दिसंबर तक प्रक्रिया पूरी करने को कहा।

पीठ ने 14 अक्टूबर को केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि वह सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को लापता बच्चों के मामलों को संभालने के लिए एक नोडल अधिकारी की नियुक्ति करने और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा संचालित मिशन वात्सल्य पोर्टल पर प्रकाशन के लिए उनके नाम और संपर्क विवरण उपलब्ध कराने का निर्देश दे। उसने निर्देश दिया था कि जब भी पोर्टल पर किसी गुमशुदा बच्चे के बारे में शिकायत प्राप्त हो तो सूचना को संबंधित नोडल अधिकारियों के साथ साझा किया जाना चाहिए।

उच्चतम न्यायालय ने इससे पहले केंद्र से लापता बच्चों का पता लगाने और ऐसे मामलों की जांच के लिए गृह मंत्रालय के तत्वावधान में एक विशेष ऑनलाइन पोर्टल बनाने को कहा था। उसने देश में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में उन पुलिस अधिकारियों के बीच समन्वय की कमी की ओर इशारा किया जिन्हें लापता बच्चों का पता लगाने का काम सौंपा जाता है। न्यायालय ने कहा था कि पोर्टल में प्रत्एक राज्य से एक विशेष अधिकारी हो सकता है जो सूचना प्रसारित करने के अलावा गुमशुदा संबंधी शिकायतों का प्रभारी भी हो सकता है।

गैर सरकारी संगठन गुरिया स्वयं सेवी संस्थान ने शीर्ष अदालत में याचिका दायर कर बच्चों के अपहरण या गुमशुदा होने के अनसुलझे मामलों के अलावा भारत सरकार द्वारा निगरानी किए जाने वाले खोयाापाया पोर्टल पर उपलब्ध सूचना के आधार पर की जाने वाली कार्वाई का उल्लेख किया था। याचिका में पिछले साल उत्तर प्रदेश में दर्ज 5 मामलों के आधार पर अपनी दलील पेश की गई, जिनमें नाबालिग लड़कों और लड़कियों का अपहरण कर उन्हें बिचौलियों के नेटवर्क के जरिए झारखंड, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में तस्करी कर ले जाया गया था।

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