एम एसनाथन रायच फाउंडेशन और यूनिवर्सिटी ऑफ इंटेलीजेंस के चित्र दक्षिण भारत में एक अध्ययन से पता चला है कि खाद्य व्यवसाय के साथ-साथ फूलों की खेती से न केवल व्यवसाय करने वाले द्वारा लाभ उठाया जाएगा, साथ ही इसमें मियामी की कंपनी और भी शामिल है। गुणवत्ता में भी सुधार किया जा सकता है।
भारत में अपनी तरह के पहले अध्ययन के नतीजे जर्नल ऑफ एप्लाइड आईकोलॉजी में प्रकाशित हुए हैं।
अपने इस अध्ययन में एरोबिक ने मोरिंगा ईसाइन (ड्रामास्टिक) की फल पर ध्यान केंद्रित किया है, जिसे
सुपरफूड के रूप में भी जाना जाता है। भारत में इसकी खेती आमतौर पर छोटे किसानों द्वारा की जाती है।
आम तौर पर सहजन का उपयोग हॉल के रूप में किया जाता है। लेकिन वास्तव में यह कई पोषक तत्वों से भरपूर होता है। साथ ही इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट गुण इसे खास बनाते हैं। वहीं बौद्ध तंत्र के अवलोकन से देखें तो पारण बेहद महत्वपूर्ण है जो वैश्विक खाद्य सुरक्षा में भी अहम भूमिका निभा रहा है। इन पैरांकों की भूमिका से यह भी समझ में आ सकता है कि यह किट 80 प्रतिशत से अधिक के मुख्य मानकों को पूरा करती है, जिसमें अनगिनत आयु वर्ग के भोजन के प्रमुख स्रोत शामिल हैं। इस अध्ययन के दौरान बागीचों में मोरिंगा के पेड़ों के साथ-साथ गेंदे के फूल और लाल चने की व्यावसायिक बिक्री से लेकर सब्जियों को फूलों पर आने वाले युवाओं की रुचि और विविधता बढ़ाने में मदद मिली, जिसके परिणामस्वरूप फलों और सब्जियों की खेती में सुधार हुआ। वृद्धि का आकलन भी किया गया।
इस बारे में यूनिवर्सिटी ऑफ इंटेलीजेंस से जुड़े इंजीनियर डॉक्टर दीपा सेनापति का कहना है कि, कृषि भूमि पर जंगली फूल उगाने की एक जांच-पड़ताल विधि है जो ब्रिटेन और पूरे यूरोप में कई कृषि क्षेत्रों और बगीचों में मौजूद है। यह कृषि तकनीक वैज्ञानिकों की संख्या बढ़ाने के लिए जानी जाती है। उनका कहना है कि, दक्षिण भारत में किसानों के सहयोग से इस शोध का मकसद मोरिंगा के बगीचों में देशी पेड़ों और अन्य पैरांकों की उपस्थिति को बढ़ाना था, ताकि सबसे प्रभावशाली सह-फूल वाली मशीनों को डिजाइन किया जा सके। तमिल में सहजन और पारणको का अध्ययन किया गया इस अध्ययन के दौरान इलेक्ट्रोनम ने कन्नीवाड़ी क्षेत्र में मोरिंगा के 24 बागों में छोटे किसानों के साथ मिलकर काम किया। जहां 12 बगीचों में उन्होंने लाल चना और गेंदा के फूल लगाए, जबकि अन्य 12 बगीचों में कोई सह-फूल वाली फेल नहीं हुई थी। इन बगीचों की तुलना करने पर पता चला कि जिन बगीचों में लाल चने और गेंदें के फूल लगाए गए वहां परांटकों की संख्या 50 प्रतिशत और उनकी विविधता 33 प्रतिशत अधिक थी। इन स्टालों पर फूलों पर आने वाले सैनिकों की संख्या और भी अधिक थी। वहीं इसके साथ ही मोरिंगा की बीज की गुणवत्ता में भी सुधार देखा गया, जहां मोरिंगा के फलियां कहीं ज्यादा बड़ी हुई थीं। वहीं लाल चने और गेंदे के फूल वाले वे स्थान जो पहले परागण की कमी से पीडि़त थे, उनके कारण वहां अधिक उत्पादन दर्ज किया गया।
इसी तरह जिन बागीचों में फूल लगाए गए थे, वहां बिना फूल बागीचों की तुलना में मोरिंगा की कटाई के फल योग्य में 30 प्रतिशत की वृद्धि आंकी गई। ऐसे में वॉर्न का कहना है कि जहां छोटे किसानों को स्वस्थ और पोषक आहार मिल से अधिक बनाया जाए और बेहतर गुणवत्ता दी जाए। साथ ही वो अपने आहार में प्रोटीन के स्रोत के रूप में लाल चने का उपयोग कर सकते हैं, वहीं गेंद के फूल बेचकर भी यह किसान अतिरिक्त आय प्राप्त कर सकते हैं। शोध के अनुसार भारत में आम और सहजन जैसी कई ऐसी फसलें हैं जो पोषण और आर्थिक दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण हैं। हालाँकि इन डिजिटल सेवाओं में महत्वपूर्ण वृद्धि और सुधार की भी संभावना है। भारत में रासायनिक रसायनों और आधुनिक उत्पादों के व्यापक उपयोग के साथ-साथ गहन कृषि तकनीकों ने भी प्राकृतिक आवासों को प्रभावित किया है। मूलत: भारत में जैव विविधता पर भी इलेक्ट्रानिक प्रभाव पड़ते हैं, जिससे देशी मधुमखियां और अन्य पारण करने वाले जीव भी प्रभावित होते हैं। रेगिस्तानी जंगलों में विशेष रूप से छोटे किसान,प्रोफ़ूट फ़सलों के देशी परानकों पर प्रतिबंध है, वो इन पर प्राकृतिक प्रभाव के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं। ऐसे अध्ययन के नतीजों में कहा गया है कि यह किसान अपनी जमीन का कहीं बेहतर तरीके से प्रबंधन करके कैसे अपना उत्पादन बढ़ा सकता है।