भारत 2036 ओलंपिक की मेज़बानी और खेलों में विश्व महाशक्ति बनने का सपना देख रहा है। यह लक्ष्य केवल किसी बड़े खेल आयोजन की मेज़बानी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें यह चुनौती भी शामिल है कि हम विश्वस्तरीय खिलाड़ियों की एक निरंतर श्रृंखला तैयार कर सकें। लेकिन बड़ा सवाल यह है, क्या हम इस सपने की बुनियाद को मजबूत कर पाए हैं? फिजिकल एजुकेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया द्वारा किए गए राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार, देश में शारीरिक शिक्षा और इसके शिक्षकों की वर्तमान स्थिति बेहद चिंताजनक है। आंकड़े बताते हैं कि अधिकांश स्कूलों में शारीरिक शिक्षा को अभी भी एक “सहायक” या “गैर-जरूरी” विषय की तरह देखा जाता है। प्राथमिक स्तर, जो बच्चों की संपूर्ण विकास यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण चरण है, वहां स्थिति और भी खराब है।
किसी भी खिलाड़ी की खेल यात्रा की शुरुआत स्कूल से होती है। स्कूलों में बच्चों के जीवन का पहला संगठित खेल अनुभव अक्सर उनके शारीरिक शिक्षा शिक्षक के माध्यम से आता है। ये शिक्षक न केवल बच्चों में खेल के प्रति रुचि जगाते हैं, बल्कि उनकी प्रतिभा को पहचानते हैं और उसे सही दिशा देने का काम भी करते हैं। शारीरिक शिक्षक बच्चों के पहले कोच होते हैं। वे न केवल उन्हें बुनियादी फिटनेस और खेल कौशल सिखाते हैं, बल्कि उन्हें अनुशासन, टीमवर्क और आत्मविश्वास का महत्व भी समझाते हैं। लेकिन भारत में आज भी प्राथमिक कक्षाओं (कक्षा 1-5) में पीई शिक्षक की नियुक्ति अनिवार्य नहीं है। यह केवल नीति की कमी नहीं है, बल्कि यह हमारे दृष्टिकोण का भी द्योतक है। कई स्कूलों में खेल पीरियड को पढ़ाई का “फालतू समय” मानकर हटा दिया जाता है। परिणामस्वरूप, बच्चों को न तो नियमित शारीरिक गतिविधि का अवसर मिलता है और न ही उनकी प्रतिभा को शुरुआती उम्र में विकसित किया जा सकता है। पेफी के सर्वेक्षण में शिक्षकों ने साफ कहा:-
“हमारा वेतन इतना कम है कि परिवार चलाना मुश्किल है। कई बार हम दूसरे काम करने को मजबूर होते हैं।”
पीई शिक्षकों को पर्याप्त वेतन, प्रशिक्षण और सम्मान नहीं मिलता, जिससे इस पेशे में प्रतिभाशाली लोगों का आना मुश्किल हो जाता है। कक्षा 1-5 में तो खेल पीरियड का नामोनिशान नहीं। पढ़ाई के नाम पर बच्चों को मैदान से दूर रखा जाता है। कोई ट्रेनिंग, कोई स्किल डेवलपमेंट नहीं है। हम सालों से वही पुराना पढ़ा रहे हैं। कई स्कूलों में खेल पीरियड को हटा कर मैथ्स या साइंस पढ़ाई जाती है। 60त्न स्कूलों में प्राथमिक स्तर पर पीई शिक्षक का पद नहीं है। 75त्न ग्रामीण स्कूलों में खेल मैदान का अभाव है। पीई शिक्षकों का औसत वेतन मात्र ?8,000- ?12,000 प्रति माह है। 90त्न शिक्षकों को पिछले 5 वर्षों में कोई अपस्किलिंग अवसर नहीं मिला है। जब हम 2036 ओलंपिक की मेज़बानी का सपना देखते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि किसी भी खेल महाशक्ति की नींव स्कूलों में ही डाली जाती है। बच्चों में खेलों की आदत, शारीरिक फिटनेस और अनुशासन का भाव प्राथमिक कक्षाओं से ही विकसित होता है। यदि इस स्तर पर बच्चों को खेल के अवसर नहीं मिलेंगे और प्रशिक्षित पीई शिक्षक नहीं होंगे, तो भारत कैसे उस प्रतिभाओं की निरंतर श्रृंखला को तैयार करेगा, जो ओलंपिक जैसे मंच पर देश का नाम रोशन कर सके? दुनिया के जिन देशों ने खेलों में अपना वर्चस्व कायम किया है, उन्होंने शिक्षा प्रणाली में शारीरिक शिक्षा को केंद्रीय स्थान दिया है। वहीं भारत में आज भी इसे सिर्फ एक “सहायक विषय” माना जाता है, न कि राष्ट्रीय प्राथमिकता। यह सोच और व्यवस्था दोनों ही खतरनाक हैं, क्योंकि खेल केवल मेडल जीतने का साधन नहीं बल्कि स्वास्थ्य, अनुशासन और जीवन कौशल का आधार हैं।
अगर हमें खेलों में उत्कृष्टता हासिल करनी है और 2036 ओलंपिक का सपना साकार करना है, तो शारीरिक शिक्षा को नीति और क्रियान्वयन दोनों स्तरों पर उच्च प्राथमिकता देनी होगी। इसके लिए हमें निम्न कदम उठाने होंगे। एनईपी 2020 का पूर्ण क्रियान्वयन हर स्कूल में खेल और फिटनेस को अनिवार्य किया जाए। शिक्षा नीति में जो प्रावधान हैं, उन्हें लागू करना समय की मांग है।
प्रशिक्षित पीई शिक्षक प्रत्येक स्कूल, विशेषकर प्राथमिक स्तर पर, में योग्य शारीरिक शिक्षा शिक्षक की नियुक्ति सुनिश्चित हो। नियमित अपस्किलिंग शिक्षकों को समय-समय पर नई तकनीकों, स्पोर्ट्स साइंस, न्यूट्रिशन और खेल में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे आधुनिक विषयों पर प्रशिक्षण मिले। इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास हर गांव और हर स्कूल में कम से कम एक खेल मैदान और आवश्यक खेल उपकरण उपलब्ध कराना। सम्मान और प्रोत्साहन पीई शिक्षकों को करियर ग्रोथ, सम्मान और प्रदर्शन आधारित प्रोत्साहन देना ताकि इस क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाएं आकर्षित हों। यदि भारत को खेलों की दुनिया में शीर्ष पर देखना है और 2036 ओलंपिक में मेडल टैली में ऊँचाई पाना है, तो हमें यह समझना होगा कि खेलों की असली शुरुआत कक्षा 1 से होती है, न कि किसी राष्ट्रीय प्रशिक्षण केंद्र से, जब तक शारीरिक शिक्षा को नीति और सोच दोनों स्तरों पर सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं मिलेगी, तब तक हमारा सपना अधूरा रहेगा।

डॉ. पीयूष जैन
राष्ट्रीय सचिव, फिजिकल एजुकेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया