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स्वास्थ्य पर प्लास्टिक से पड़ने वाले प्रभाव के मामले 2040 तक दोगुने होने की आशंका: लांसेट अध्ययन

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प्लास्टिक के उत्पादन के दौरान निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसों, वायु-प्रदूषक कणों और विषैले रसायनों समेत दुनिया भर में प्लास्टिक प्रणाली से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव के मामले 2016 की तुलना में 2040 तक दोगुने से भी अधिक होने की आशंका है। एक अध्ययन में यह आशंका जताई गई है। द लांसेट प्लैनेटरी हेल्थ पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन ने यह भी रेखांकित किया कि प्लास्टिक का वैश्विक उत्पादन 2100 के बाद तक भी चरम पर नहीं पहुंचा होगा यानी पहले से ही दबाव झेल रही प्रणाली में पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संबंधी बोझ अभी और बढ़ेगा।

लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन तथा फ्रांस के संस्थानों के शोधकर्ताओं ने कहा कि प्लास्टिक प्रदूषण और इसके जीवनचक्र के दौरान होने वाले उत्सर्जन के मानव स्वास्थ्य पर संभावित प्रतिकूल प्रभावों को तेजी से पहचाना जा रहा है, लेकिन अब भी यह पूरी तरह पता नहीं लगाया जा सका है कि इसका प्रतिकूल प्रभाव का कुल पैमाना कितना है। उन्होंने कहा कि प्लास्टिक के जीवनचक्र के दौरान स्वास्थ्य प्रभावों का आकलन प्रदूषण के खिलाफ वैश्विक कार्रवाई को दिशा दे सकता है और समस्या से निपटने के लिए पर्यावरण, अर्थव्यवस्था एवं स्वास्थ्य के स्तर पर सतत प्रक्रिया को बढ़ावा दे सकता है।

टीम ने कहा कि प्लास्टिक की रासायनिक संरचना का खुलासा नहीं किया जाना जीवनचक्र आकलनों को गंभीर रूप से सीमित कर रहा है जिससे प्रभावी नीति को दिशा देने में बाधा पैदा होती है। शोधकर्ताओं ने कहा कि इस अध्ययन के दौरान विश्लेषण किए गए प्लास्टिक उत्पादों के जीवनचक्र में कच्चे माल के निष्कर्षण से लेकर पॉलिमर उत्पादन, उपभोग के बाद अपशिष्ट संग्रहण, पुनर्चक्रण प्रौद्योगिकियां, कचरा-स्थल, खुले में जलाना और पर्यावरणीय प्रदूषण शामिल हैं। शोधकर्ताओं ने कहा, हमने पाया कि प्लास्टिक के जीवनचक्र के दौरान होने वाले उत्सर्जन ने ग्लोबल वॉर्मिंग , वायु प्रदूषण, विषाक्तता से जुड़े कैंसर और गैर-संचारी रोगों के कारण मानव स्वास्थ्य पर बोझ को बढ़ाया और सबसे अधिक नुकसान प्राथमिक प्लास्टिक के उत्पादन तथा इसे खुले में जलाने से हुआ।

उन्होंने अनुमान जताया कि वैश्विक प्लास्टिक प्रणाली के कारण स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव के मामले 2016 की तुलना में 2040 में दोगुने से भी अधिक हो जाने की आशंका है। शोधकर्ताओं ने कहा कि प्लास्टिक उत्सर्जन और स्वास्थ्य पर उसके प्रभाव को प्रभावी ढंग से कम करने के लिए नीति-निर्माताओं को गैर-आवश्यक उपयोगों के लिए नए प्लास्टिक के उत्पादन को बेहतर ढंग से विनियमित करना होगा और उसमें उल्लेखनीय कमी करनी होगी ताकि प्लास्टिक उत्सर्जन और स्वास्थ्य पर इसके प्रतिकूल असर को प्रभावी ढंग से कम किया जा सके। दुनिया के 175 से अधिक देशों ने वैश्विक प्लास्टिक संधि विकसित करने पर सहमति जताई है और इस पर बातचीत चल रही है।

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